मौर्य और गुप्त साम्राज्य: प्रमुख शासक, प्रशासनिक ढांचा और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
प्राचीन भारत के दो महान साम्राज्यों—मौर्य और गुप्त काल के प्रमुख शासकों, प्रशासनिक प्रणालियों, प्रमुख अभिलेखों एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी अध्ययन।
⭐ मुख्य बिंदु
- मौर्य साम्राज्य की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में चाणक्य की सहायता से नंद वंश को उखाड़कर की।
- मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन को 6 समितियों (प्रत्येक में 5 सदस्य) में विभाजित बताया था।
- सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के बाद भेरीघोष के स्थान पर धम्मघोष की नीति अपनाई।
- चंद्रगुप्त प्रथम ने 319-320 ईस्वी में गुप्त संवत् चलाया और महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
- हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के विजय अभियानों और नीतियों का मुख्य स्रोत है।
- चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के दरबार में कालिदास और वराहमिहिर सहित नवरत्न निवास करते थे।
- नालंदा विश्वविद्यालय की नींव कुमारगुप्त प्रथम ने रखी, जबकि हूणों के आक्रमण को स्कंदगुप्त ने विफल किया।
- मौर्य प्रशासन अत्यंत केंद्रीकृत था, जबकि गुप्त काल में सामंतवाद और भूमि अनुदान से विकेंद्रीकरण बढ़ा।
परिचय: मगध की भूमि पर दो युगांतरकारी साम्राज्यों का उदय
भारतीय इतिहास में मगध का क्षेत्र राजनीतिक एकीकरण और साम्राज्य निर्माण का केंद्र रहा है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में स्थापित मौर्य साम्राज्य और चौथी शताब्दी ईस्वी में उदित गुप्त साम्राज्य ने भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को गहराई से रूपांतरित किया। जहां मौर्य काल कठोर केंद्रीय सत्ता, सुदृढ़ प्रशासनिक तंत्र और सर्वसमावेशी लोक-कल्याणकारी नीति (धम्म) के लिए विख्यात है, वहीं गुप्त काल को कला, विज्ञान, खगोलिकी, साहित्य और मंदिर स्थापत्य के चरमोत्कर्ष के कारण ‘प्राचीन भारत का स्वर्ण युग’ (Classical Age) कहा जाता है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य लोक सेवा आयोग (BPSC, UPPSC, MPPSC) और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी परीक्षाओं में इन दोनों साम्राज्यों के शासकों, प्रशासनिक शब्दावलियों, अभिलेखों तथा सिक्कों से प्रतिवर्ष बहुविकल्पीय व विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू. – 185 ई.पू.): प्रमुख शासक व उपलब्धियां
मौर्य वंश की स्थापना ने भारत को पहली बार एक एकीकृत राजनीतिक छत्रछाया प्रदान की। इस काल की प्रामाणिक जानकारी कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’, मेगस्थनीज की ‘इंडिका’, विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’ और सम्राट अशोक के अभिलेखों से प्राप्त होती है।
1. चंद्रगुप्त मौर्य (322 – 298 ई.पू.)
- संस्थापक: चाणक्य (विष्णुगुप्त/कौटिल्य) की सहायता से नंद वंश के अंतिम अत्याचारी शासक धनानंद को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
- सेल्युकस निकेटर से युद्ध: 305 ई.पू. में सिकंदर के सेनापति सेल्युकस निकेटर को परास्त किया। संधि के तहत सेल्युकस ने एरिया (हेरात), अराकोसिया (कंधार), गेड्रोसिया (बलूचिस्तान) और पेरोपेमिसडाई (काबुल) चंद्रगुप्त को सौंपे तथा अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चंद्रगुप्त से किया।
- मेगस्थनीज का आगमन: सेल्युकस ने मेगस्थनीज को पाटलिपुत्र में राजदूत बनाकर भेजा, जिसने भारत के सामाजिक व प्रशासनिक जीवन पर ‘इंडिका’ ग्रंथ रचा।
- अंतिम समय: जैन परंपरा के अनुसार, चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली और श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में चंद्रगिरि पहाड़ी पर ‘संलेखना’ (संथारा) पद्धति से प्राण त्यागे।
2. बिंदुसार (298 – 273 ई.पू.)
- उपाधियां: यूनानी स्रोतों में इन्हें ‘अमित्रोकेट्स’ (अमित्रघात यानी शत्रुओं का संहारक) कहा गया है। वायु पुराण में ‘भद्रसार’ और जैन ग्रंथों में ‘सिंहसेन’ कहा गया।
- विदेशी संबंध: सीरियाई सम्राट एंटिओकस प्रथम ने डाइमेकस को तथा मिस्र के टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने डायोनिसियस को राजदूत बनाकर बिंदुसार के दरबार में भेजा। बिंदुसार ने एंटिओकस से मीठी मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक की मांग की थी (दार्शनिक को छोड़कर शेष दोनों वस्तुएं भेजी गईं)।
- धार्मिक झुकाव: बिंदुसार ‘आजीवक संप्रदाय’ के अनुयायी थे। इनके शासनकाल में तक्षशिला में हुए विद्रोह को दबाने के लिए पहले सुसीम और फिर अशोक को भेजा गया।
3. सम्राट अशोक (268 – 232 ई.पू.)
- सिंहासनारोहण: बिंदुसार की मृत्यु के बाद 4 वर्ष के उत्तराधिकार संघर्ष के पश्चात 268 ई.पू. में विधिवत राज्याभिषेक हुआ। अभिलेखों में इन्हें ‘देवानांप्रिय’ (देवताओं का प्रिय) और ‘प्रियदर्शी’ कहा गया है। मास्की, गुर्जरा, नेतुर और उडेगोलम अभिलेखों में वास्तविक नाम ‘अशोक’ मिलता है।
- कलिंग युद्ध (261 ई.पू.): राज्याभिषेक के 8वें वर्ष (261 ई.पू.) में कलिंग पर आक्रमण हुआ। 13वें प्रमुख शिलालेख के अनुसार, भीषण नरसंहार से व्यथित होकर अशोक ने ‘भेरीघोष’ (युद्ध की नीति) का त्याग कर ‘धम्मघोष’ (सांस्कृतिक व नैतिक विजय) अपनाया।
- बौद्ध धर्म व धम्म प्रचार: उपगुप्त के प्रभाव में आकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया। तीसरे बौद्ध संगीति का आयोजन पाटलिपुत्र में मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में कराया। पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु श्रीलंका भेजा।
- अभिलेखों का वर्गीकरण: अशोक प्रथम भारतीय सम्राट थे जिन्होंने जनता से सीधे अभिलेखों के माध्यम से संवाद किया। जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में सर्वप्रथम ब्राह्मी लिपि में लिखे अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की। ये अभिलेख चार लिपियों (ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरमाइक और ग्रीक) में उत्कीर्ण हैं।
मौर्य साम्राज्य का पतन और अंतिम शासक
अशोक के बाद कुणाल, दशरथ, संप्रति जैसे दुर्बल उत्तराधिकारी हुए। 185 ई.पू. में अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सैन्य निरीक्षण के दौरान कर दी और मगध में ‘शुंग वंश’ की स्थापना की।
मौर्य प्रशासन: केंद्रीयकरण का सर्वोच्च स्वरूप
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के सात अंग (सप्तांग सिद्धांत) होते हैं—स्वामी (राजा), अमात्य (अधिकारी), जनपद (भूभाग व जनता), दुर्ग (किला), कोश (राजस्व), दंड/बल (सेना) और मित्र।
- केंद्रीय प्रशासन (तीर्थ): शीर्ष 18 पदाधिकारियों को ‘तीर्थ’ या ‘महामात्र’ कहा जाता था। जैसे- समाहर्ता (राजस्व संग्रहकर्ता), सन्निधाता (शाही कोषाध्यक्ष), व्यावहारिक (नगर का मुख्य न्यायाधीश), सेनापति।
- अध्यक्ष: विभिन्न विभागों के अध्यक्षों की संख्या 27 थी। जैसे- सीताध्यक्ष (राजकीय कृषि भूमि प्रमुख), पण्याध्यक्ष (व्यापार व वाणिज्य नियंत्रक), लक्षणाध्यक्ष (मुद्रा जारीकर्ता), आकराध्यक्ष (खान प्रमुख)।
- गुप्तचर व्यवस्था: कौटिल्य ने गुप्तचरों को ‘गूढ़पुरुष’ कहा। ये दो प्रकार के थे—‘संस्था’ (एक स्थान पर रहकर कार्य करने वाले) और ‘संचारा’ (भ्रमणशील)।
- नगर प्रशासन: मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र का प्रशासन 30 सदस्यों का एक मंडल करता था, जो 6 समितियों (प्रत्येक में 5 सदस्य) में विभाजित था—शिल्प कला, विदेशियों की देखरेख, जन्म-मरण पंजीकरण, व्यापार-वाणिज्य, वस्तु निरीक्षण और बिक्री कर संग्रहण।
गुप्त साम्राज्य (लगभग 319 ई. – 550 ई.): शासक और स्वर्ण युग की विरासत
कुषाणों के सामंत रहे गुप्तों ने उत्तरी भारत में पुनः राजनीतिक एकता स्थापित की। गुप्त साम्राज्य की राजभाषा संस्कृत थी और गरुड़ इनका राजचिह्न था।
1. प्रारंभिक शासक और चंद्रगुप्त प्रथम (319 – 335 ई.)
- संस्थापक: श्रीगुप्त (लगभग 275 ई.) ने नींव रखी, उनके पुत्र घटोत्कच हुए। दोनों ने केवल ‘महाराज’ की उपाधि धारण की, जिससे स्पष्ट है कि वे अधीनस्थ शासक थे।
- वास्तविक संस्थापक: चंद्रगुप्त प्रथम ने 319-320 ई. में ‘गुप्त संवत्’ का प्रवर्तन किया और पहली बार ‘महाराजाधिराज’ की भव्य उपाधि धारण की। लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाई तथा ‘राजा-रानी प्रकार’ के स्वर्ण सिक्के जारी किए।
2. समुद्रगुप्त (335 – 380 ई.): ‘भारत का नेपोलियन’
- सैन्य अभियान और नीतियां: इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने सैन्य प्रतिभा के कारण इन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ कहा। दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित ‘प्रयाग प्रशस्ति’ (इलाहाबाद स्तंभ लेख) में समुद्रगुप्त के अभियानों का विस्तृत वर्णन है:
- आर्यावर्त (उत्तर भारत): 9 राजाओं का पूर्ण उन्मूलन (प्रसभोद्धरण नीति)।
- दक्षिणापथ (दक्षिण भारत): 12 राजाओं को हराकर मुक्त किया (ग्रहण-मोक्षानुग्रह नीति/धर्मविजय)।
- प्रत्यंत (सीमावर्ती राज्य): सर्वकरदान, आज्ञाकरण नीति।
- विदेशी शक्तियां (शक, कुषाण): आत्मनिवेदन, कन्योपायन नीति।
- सांस्कृतिक पहलू: समुद्रगुप्त कुशल वीणा वादक थे (सिक्कों पर वीणा बजाते हुए दर्शाया गया) और उन्हें ‘कविराज’ की उपाधि दी गई थी। अश्वमेध यज्ञ कराकर ‘अश्वमेध पराक्रमांक’ सिक्के जारी किए। लंका के राजा मेघवर्मन को बोधगया में बौद्ध मठ बनाने की अनुमति दी थी।
3. चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (380 – 412 ई.)
- शकों का विनाश: मालवा और गुजरात के शक क्षत्रपों (विशेषकर रुद्रसिंह तृतीय) को पराजित कर ‘शकारि’ और ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। इस विजय के उपलक्ष्य में चांदी के सिक्के (रुप्यक) जारी किए।
- वैवाहिक कूटनीति: नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया और अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से कराया। प्रभावती गुप्त के माध्यम से दक्कन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया।
- नवरत्न: चंद्रगुप्त द्वितीय की उज्जैन स्थित दूसरी राजधानी में 9 प्रकांड विद्वान (नवरत्न) थे—कालिदास, धन्वंतरि, वराहमिहिर, अमरसिंह, शंकु, क्षपणक, बेतालभट्ट, घटकर्पर और वररुचि।
- फाह्यान की यात्रा: चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान (399-414 ई.) इन्हीं के समय भारत आया और गुप्त साम्राज्य की शांति, संपन्नता व अहिंसा की प्रशंसा की।
- महरौली लौह स्तंभ: दिल्ली में कुतुब परिसर स्थित महरौली लौह स्तंभ पर ‘चंद्र’ नाम उत्कीर्ण है, जो चंद्रगुप्त द्वितीय की वैज्ञानिक व धातुकर्म उपलब्धियों का साक्ष्य है।
4. कुमारगुप्त प्रथम (415 – 455 ई.)
- उपाधि ‘महेंद्रादित्य’। इनके शासनकाल में सर्वाधिक गुप्तकालीन अभिलेख व सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने कराई थी, जो बौद्ध दर्शन और उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बना।
- शासन के अंतिम वर्षों में पुष्यमित्र नामक जाति और हूणों का पहला आक्रमण हुआ, जिसे इनके वीर पुत्र स्कंदगुप्त ने विफल किया।
5. स्कंदगुप्त (455 – 467 ई.)
- हूणों का दमन: जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार, बर्बर हूण आक्रांताओं (म्लेच्छों) को परास्त कर आर्यावर्त की रक्षा की। उपाधि: ‘क्रमादित्य’ और ‘शक्रादित्य’।
- सुदर्शन झील का पुनरुद्धार: सौराष्ट्र के प्रांतीय गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने मौर्यकालीन सुदर्शन झील के बांध का पुनर्निर्माण कराया और किनारे विष्णु मंदिर बनवाया।
- साम्राज्य का पतन: स्कंदगुप्त के बाद पुरगुप्त, नरसिंहगुप्त बालादित्य, भानुगुप्त (जिनके 510 ई. के एरण अभिलेख में सर्वप्रथम सती प्रथा का लिखित साक्ष्य मिलता है) और अंतिम मान्य शासक विष्णुगुप्त (तृतीय) के साथ गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। पतन के मुख्य कारण—हूणों के निरंतर आक्रमण, सामंती प्रवृत्तियों का उदय और व्यापारिक ह्रास।
मौर्य और गुप्त साम्राज्य का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण
| तुलनात्मक बिंदु | मौर्य साम्राज्य (322 – 185 ई.पू.) | गुप्त साम्राज्य (319 – 550 ई.) |
|---|---|---|
| शासन का स्वरूप | अत्यधिक केंद्रीकृत, राजा सर्वाधिकार संपन्न, विशाल नौकरशाही | विकेंद्रीकृत व सामंतवादी व्यवस्था, स्थानीय शासकों को स्वायत्तता |
| प्रशासनिक इकाइयां | साम्राज्य → चक्र/प्रांत (आर्यपुत्र) → आहार/विषय → स्थानिक/द्रोणमुख → ग्राम | साम्राज्य → भुक्ति (उपरिक) → विषय (विषयपति) → वीथि → ग्राम (ग्रामिक) |
| भूमि अनुदान | नकद वेतन की प्रथा मुख्य; भूमिदान अत्यंत सीमित | ब्राह्मणों व अधिकारियों को अग्रहार (करमुक्त भूमि) देने की व्यापक प्रथा |
| मुद्रा प्रणाली | चांदी के आहत (पंचमार्क) सिक्के, पण, अर्ध-पण | विशाल पैमाने पर उत्कृष्ट स्वर्ण मुद्राएं (दीनार) तथा चांदी के सिक्के (रुप्यक) |
| धर्म व दर्शन | प्रारंभ में जैन/आजीवक, बाद में बौद्ध धर्म (अशोक का धम्म) को राज्याश्रय | वैष्णव व शैव (भागवत) धर्म का पुनरुत्थान, परमभागवत की उपाधियां, सहिष्णुता |
| कला व वास्तुकला | एकाश्मक एकाश्म प्रस्तर स्तंभ, मौर्यकालीन पॉलिश, सांची स्तूप, गुहाएं | शिखरयुक्त संरचनात्मक हिंदू मंदिर (देवगढ़ का दशावतार), अजंता चित्रकला, लौह स्तंभ |
| साहित्य की भाषा | प्राकृत और अर्धमागधी मुख्य, जनभाषा को प्राथमिकता | संस्कृत का स्वर्णकाल; शास्त्रीय काव्य, नाटक और दर्शन की रचना |
| विदेशी यात्री विवरण | मेगस्थनीज (ग्रीस) – ‘इंडिका’ | फाह्यान (चीन) – ‘फो-को-की’ |
याद रखने की स्मार्ट ट्रिक (Mnemonics)
1. मौर्य शासकों का क्रम: 'चन्द्र-बिन्दु-अशोक'
सूत्र: ‘चंद्र ने बिंदु से अशोक खिलाया’
व्याख्या: चन्द्र (चंद्रगुप्त मौर्य) → बिन्दु (बिंदुसार) → अशोक (सम्राट अशोक)। अंतिम शासक याद रखें: बृहद्रथ (बड़ा रथ रुका = पुष्यमित्र ने रोका)।
2. गुप्त शासकों का मुख्य क्रम: 'श्री-चन्द्र-समुद्र-चन्द्र-कुमार-स्कन्द'
सूत्र: ‘श्री चंद्र समुद्र में तैरकर विक्रमादित्य कुमार के स्कंद (कंधे) पर बैठे’
व्याख्या: श्रीगुप्त → चंद्रगुप्त प्रथम → समुद्रगुप्त → चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) → कुमारगुप्त प्रथम → स्कंदगुप्त।
3. अशोक के चार प्रमुख शिलालेख लिपियां
सूत्र: ‘ब्राह्मी भारत में, खरोष्ठी पाकिस्तान में, ग्रीक-अरमाइक अफगानिस्तान में’
शाहबाजगढ़ी और मानसेहरा (पाकिस्तान) खरोष्ठी लिपि (दाएं से बाएं) में हैं; कंधार द्विभाषी (ग्रीक व अरमाइक) है; शेष अधिकांश भारत में ब्राह्मी लिपि (बाएं से दाएं) में हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे पूछा जाता है? (PYQ Patterns)
- प्रशासनिक शब्दावली (Terminology): UPSC व State PCS में सीधा मिलान पूछा जाता है—जैसे ‘सीताध्यक्ष’ (राजकीय कृषि), ‘समाहर्ता’ (कर संग्राहक), ‘उपरिक’ (गुप्त प्रांतीय गवर्नर), ‘विष्टि’ (मुफ्त बेगार श्रम)।
- अभिलेख और उनके लेखक: प्रयाग प्रशस्ति (हरिषेण - समुद्रगुप्त), जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन व स्कंदगुप्त), एरण अभिलेख (भानुगुप्त - सती प्रथा), भाब्रू/बैराट अभिलेख (अशोक का बौद्ध धर्म में विश्वास)।
- नवरत्न और उनकी रचनाएं: SSC और BPSC में कालिदास की कृतियों (मेघदूत, ऋतुसंहार, अभिज्ञानशाकुंतलम्), वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’, आर्यभट्ट की ‘आर्यभटीय’ पर प्रश्न आते हैं।
- सिक्कों के प्रकार: समुद्रगुप्त के वीणावादन व अश्वमेध प्रकार के सिक्के, चंद्रगुप्त प्रथम के कुमारदेवी प्रकार के सिक्के, चंद्रगुप्त द्वितीय के व्याघ्र-निहंता व चांदी के सिक्के।
हालिया ऐतिहासिक अनुसंधान व अद्यतन समझ
इतिहास लेखन में पूर्ववर्ती इतिहासकारों ने गुप्त काल को बिना शर्त ‘स्वर्ण युग’ करार दिया था, परंतु आधुनिक शोध (जैसे प्रो. आर. एस. शर्मा का सामंतवाद सिद्धांत) इंगित करता है कि इस काल में भूमि अनुदानों के कारण दासों व किसानों की पराधीनता बढ़ी, विष्टि (बेगार) का प्रसार हुआ और व्यापार में गिरावट आई। यद्यपि यह सांस्कृतिक दृष्टि से शास्त्रीय काल (Classical Age) था, आर्थिक रूप से यह विकेंद्रीकरण और नगरीय ह्रास का प्रारंभिक चरण था। वर्तमान परीक्षा प्रवृत्तियों में इसी विश्लेषक समझ पर प्रश्न बनाए जा रहे हैं।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| मौर्य साम्राज्य संस्थापक | चंद्रगुप्त मौर्य (322 ई.पू.) |
|---|---|
| गुप्त वंश संस्थापक व वास्तविक संस्थापक | श्रीगुप्त (संस्थापक), चंद्रगुप्त प्रथम (वास्तविक संस्थापक) |
| अशोक के अभिलेख पढ़ने वाला प्रथम व्यक्ति | जेम्स प्रिंसेप (1837 ई.) |
| भारत का नेपोलियन उपाधि प्राप्त शासक | समुद्रगुप्त (वी. ए. स्मिथ द्वारा प्रदत्त) |
| सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य | एरण अभिलेख (510 ई., भानुगुप्त काल) |
| नालंदा विश्वविद्यालय के संस्थापक | कुमारगुप्त प्रथम (महेंद्रादित्य) |
| अंतिम मौर्य एवं गुप्त सम्राट | बृहद्रथ (मौर्य) एवं विष्णुगुप्त तृतीय (गुप्त) |
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
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Q1 कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार मौर्य काल में राजकीय कृषि भूमि के प्रबंधन एवं देखरेख का कार्य किस अधिकारी द्वारा किया जाता था?
Q2 प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
Q3 किस गुप्त शासक ने हूणों के आक्रमण को सफलतापूर्वक विफल किया तथा सौराष्ट्र में सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया?
Q4 मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ के अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन कुल कितने सदस्यों के मंडल द्वारा संचालित होता था?
Q5 प्राचीन भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम सती प्रथा का अभिलेखीय प्रमाण किस अभिलेख से प्राप्त होता है?







